पिछले सप्ताह दो खबरें पूरे समाचार जगत में अनर्थ के अंधकार की तरह छाई रहीं। एक तो यह कि नव-धनाढय वर्ग के जीवित देवता श्रीश्री रविशंकर ने यह कहा कि सरकारी स्कूल बंद कर दिए जाने चाहिए और शिक्षा का दायित्व निजी हाथों में सौंप दिया जाना चाहिए और दूसरे योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने 'गरीबी की रेखा' की जो नई परिभाषा गढ़ी, और यह 'सुखद' समाचार दिया कि उनकी गणना के मान से भारत में गरीबों की संख्या में सात प्रतिशत की कमी आई है। उनके बुध्दिजीवी साथियों जिन में लार्ड मेघनाथ देसाई शामिल हैं, ने उनकी इस गणना का समर्थन किया। हालांकि अपनी बात के समर्थन में वे सड़कों पर नहीं उतरे क्योंकि अगर कहीं वे सड़क पर उतर आते तो अपने समर्थन के तर्कों पर उन्हें पुनर्विचार करना पड़ता। गरीब आदमी के चेहरे पर रोशनी लाने में इन अर्थशास्त्रियों के चमकते चेहरे कतई समर्थ नहीं हैं। इस बात को वे भी समझते हैं। 'टाईम्स ऑफ इंडिया' के अपने एक आलेख में बच्ची करकरिया ने श्री मोंटेक सिंह का नाम उचित ही 'मनी टेक सिंह' लिखा है। यह विडंबना है कि भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष को देश में गरीबी की रेखा के मापदंड को समझने के लिए वर्ष भर में दर्जनों बार संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्राएं करनी पड़ती हैं। गरीबी की रेखा गरीब आदमी के चेहरे पर अपनी पूरी पारदर्शिता के साथ दिखाई देती है, उसे पढ़ने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यता नहीं होनी चाहिए। गरीबी की रेखा गरीब आदमी की धमनियों में धीमी गति से चलती है और उसे पकड़कर उसमें जरूरी खाद-पानी डालना कोई मुश्किल काम नहीं है पर योजना आयोग में बैठे नौकरशाह अपनी गिनती और अपने आंकडों में मुंह छिपाए बैठे रहते हैं और अपना एक छद्म संसार रच लेते हैं। उन्हें लगता है कि देश की पूरी धन सम्पदा का स्रोत वे हैं। वे यह भूलते हैं कि तथ्य इसके ठीक विपरीत है। देश का मेहनतकश आदमी, किसान, मजदूर, रिक्शेवाला, फल और सब्जी के ठेले लगाने वाला, तकनीशियन, छोटा-मोटा सरकारी कर्मचारी-चपरासी, क्लर्क और लेखापाल, यह सारी जनता जो शहरों में, पहाड़ों पर और समुद्र के किनारे पर मछली पकड़ने वाले मछुआरे- ये सब जो काम करते हैं और टैक्स भरते हैं, यह सारा पैसा उनका है, जिस पर उनका हक बनता है। देश की लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत योजना आयोग सिर्फ एक संस्था है और उसका काम जनता के इस पैसे का हिसाब रखते हुए ऐसी नीतियां बनाना है कि देश का अर्थतंत्र विकसित हो सके या फिर इस बात की तटस्थ मीमांसा करना भी है कि किस राज्य ने किन योजनाओं के तहत आबंटित पैसे का उपयोग अपने राज्य की दूरगामी जन कल्याण योजनाओं के लिए खर्च किया है कि उनके राज्य के आम आदमी के जीवन-स्तर में पर्याप्त सुधार आ सके। योजना आयोग को राज्यों को उनके संसाधनों के मुताबिक पैसा आबंटित करना चाहिए न कि राजनैतिक पक्षधरता से या उस तरह कि जैसे हम किसी भिखारी को उस तरह से पैसे दें कि वह भीख मांगने का एक नया कटोरा खरीद सके। सारी गडबड़ी गरीबी की रेखा मापने के हमारे मानदंडों में है। संभवत: यह एक मानदंड है कि अगर किसी व्यक्ति के पास इतने संसाधन हैं कि वह एक नियत मात्रा में 'कैलोरींज' ले सकता है तो वह गरीब नहीं हैं। पता नहीं किन विवेकहीन लोगों की यह सोच थी या इसका वैज्ञानिक आधार क्या था पर एक मामूली तरह से सोचने वाले व्यक्ति की समझ में भी जो बात आती है वह यह कि- एक आदमी के पास रहने के लिए छत न हो, पहनने के लिए कपड़ा न हो, जिसकी सारी इच्छाएं मर चुकी हों, जो बहुत दूर तो क्या अपने पास तक देख न सकता हो, उसके पास कमाई का कोई साधन न हो- उसे कुछ 'कैलोरींज' देकर क्या कोई भी सरकार अपने कर्तव्य की इतिश्री कर सकती है। चूंकि यह किसी एक व्यक्ति का किस्सा नहीं है- सैकड़ों, हजारों, लाखों, करोड़ों की तादाद में, पूरे देश में एक बहुत बडा गरीब तबका गरीबी की उनकी खींची हुई रेखा के नीचे जीवनयापन करने पर विवश है, तो निश्चित ही यह सरकार की गलत आर्थिक नीतियों का नतीजा है। इन नीतियों को सुधारने की जगह सरकार उन पर पर्दा डालने की कोशिश लगातार करती है और यह आम आदमी को दिखाई दे रहा है पर योजना आयोग को दिखाई नहीं देता क्यों? ऐसे ही जैसे कि श्रीश्री रविशंकर को यह दिखाई नहीं देता कि देश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे गरीबी की हालत में भी पढ़ तो रहे हैं। उनके पास साधन नहीं है फिर भी एक प्राथमिक पाठशाला उन्हें शरण देती है। जिस निजी क्षेत्र की शिक्षा की बात श्रीश्री रविशंकर करते हैं वहां तो पैसा मनुष्य को रौंदता हुआ चलता है। वे स्कूल तो अमेरिका से संचालित होते हैं, उनका तो भारतीयता और भारतीय जीवन तथा उसकी मूल्यबध्दता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। श्रीश्री कहते हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे नक्सली होते हैं। यह घोर आपत्तिजनक बात है और साथ ही झूठ भी। सच बात तो यह है कि जिस तरह देश में शिक्षा का निजीकरण हुआ है और एक नया युवा आभिजात्य वर्ग सामने आया है, जिसका देश की जड़ों के साथ कुछ भी लेना-देना नहीं है, उसके प्रतिफलन के रूप में नक्सलवाद का फैलाव हुआ है। आप देश के सारे निजी शिक्षण संस्थान बंद कर दीजिए और अमीर या गरीब की परवाह किए बगैर सबको शिक्षा के समान अवसर दे दीजिए तो आप देखेंगे कि नक्सलवाद की रेखा, अपने आप ही आप की हथेलियों से गायब होती दिखेगी। इस बीच अन्ना हजारे ने एक बार फिर जन-लोकपाल बिल के लिए नई दिल्ली में एक दिन का सांकेतिक अनशन किया है। यह न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि दु:खद भी है। देश की संसद को गौण करने की कोई भी कोशिश अंतत: एक तरह का राष्ट्र-द्रोह ही कहलाएगी। यह अलग बात है कि अगर आप को पूरी ईमानदारी से यह लगता है कि संसद में कुछ ऐसे लोग पहुंच जाते हैं जिनका आचरण नैतिक मूल्यों पर खरा नहीं उतरता या जिनका लोक-जीवन संदिग्ध है तो आपको उसके लिए जन-चेतना जागृत करने का काम करना चाहिए पर यह एक भोली सी इच्छा होगी क्योंकि आपके साथ तो श्रीश्री और बाबा रामदेव जैसे लोग खड़े है जिनका अपना नैतिक-संदेश ही संदिग्ध है या फिर आपके साथ अरविन्द केजरीवाल और सुश्री किरण बेदी हैं जो स्वयं नौकरशाह रहे हैं और अपना टैक्स समय पर न देने और फर्जी दौरा बिल भरने के आरोप झेल रहे हैं। अन्ना हजारे को देश की आम जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि जनलोकपाल बिल कोई ऐसा जादू का पिटारा नहीं है कि खुल जा सिमसिम कहते ही अलादीन का कोई चिराग बाहर आ जाएगा और देश की सभी समस्याओं का निदान कर देगा। यह पहला कदम भी नहीं है- पहला कदम है गरीबी की रेखा का पुनर्निर्धारण और सभी को शिक्षा के समान अवसर मुहैया कराना। जब तक यह नहीं हो जाता तब तक तो यह ठीक है कि - 'प्रभु जी हम गरीब, तुम पालनहार-' tejinder.gagan@gmail.com | |
DESHBANDHU mein aaj prakashit mera column.
जयपुर का साहित्य उत्सव इन दिनों चर्चा में है। सच बात तो यह है कि किसी भी उत्सव में उसके साथ एक तरह की प्रसन्नता का जुड़े होना जरूरी होता है। वह भी अगर लेखन जैसी विधा हो तो और ज्यादा क्योंकि लेखन को अन्य कलाओं से कुछ अलग करके देखा जाता है। दरअसल लेखन को सिर्फ कला के लिए नहीं जाना जा सकता। जो लोग लेखन को सिर्फ कला का माध्यम मानते हैं उनकी समझदारी पर तो सिर्फ संदेह ही किया जा सकता है। लेखन का सीधा संबंध सामान्य जनमानस के दुख और सुख के साथ साझेदारी तो है ही, उसके भीतर मनुष्य को मनुष्य समझने और सामाजिक समरसता की समझ पैदा करने की ताकत भी होनी चाहिए। तभी उस लेखन को सार्थक कहा जा सकता है और अर्थपूर्ण भी। ऐसा नहीं है कि जयपुर के साहित्य उत्सव में जो लेखक भाग ले रहे हैं उनके भीतर यह समझ नहीं है बल्कि उनमें विश्व की अनेक बोलियों और भाषाओं के वे लेखक शामिल हैं जिन पर किसी भी समाज को गर्व हो सकता है। बड़ी संख्या में जयपुर में उपस्थित लेखक गंभीर विचार विमर्श में व्यस्त हैं, पर फिर भी इस अंतर्राष्ट्रीय उत्सव की पृष्ठभूमि पर संदेह क्यों होता है? उत्सव की सबसे बड़ी कमजोरी उसमें हिंदी के उन लेखकों की अनुपस्थिति है जो कि हमारे देश के यथार्थ और समकालीन समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेखकों के इस उत्सव में एक तरह के अभिजात्य का रंग दिखाई देता है और जहां वे बैठते हैं उसके पीछे बैंक ऑफ अमेरिका का बड़ा सा पर्दा दिखाई देता है। यही सब से बड़ा दर्प है। पता नहीं अंग्रेजी का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस बात को कब समझेगा कि भारत में आयोजित किया जाने वाला हर उत्सव तब तक कोई मायने नहीं रखता जब तक कि उसकी जड़ें, भारतीय जनमानस के साथ गहरा रिश्ता न रखती हों। हिन्दी के जिन लेखकों को अभी तक इस उत्सव में भाग लेते हुए सुना है उनमें सिर्फ डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल हैं जिन्होंने भक्ति और मध्यकाल पर अपनी महत्वपूर्ण बातें कही हैं। उन्होंने कहा कि भक्ति की कविता मनुष्य को मनुष्य बनाती है, भक्ति में समर्पण का अर्थ भागीदारी और संवेदना से है, यह सामंत और चाकर का संबंध नहीं है। डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल के शब्दों में मध्यकाल हिन्दुस्तान का आधुनिक काल है। मानव-अधिकार एक सभ्य समाज का अधिकार है और उनमें अभिव्यक्ति का अधिकार सबसे बड़ा है।
डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो हिन्दी के नाम पर जयपुर साहित्य उत्सव में अशोक चक्रधर हैं जो कि ''खिली बत्तीसी'' का पाठ कर रहे हैं या फिर उनके बरक्स फिल्मी लेखक गुलंजार हैं जो पता नहीं हिन्दी के हैं या नहीं क्योंकि वे स्वयं ही किसी मंच से अपने आप को उर्दू से जोड़ते हैं तो किसी मंच से पंजाबी के साथ, भाषा को छोड़ भी दें तो संवेदना के स्तर पर भी वे मध्य वर्ग के एक सीमित तबके के करीब उसकी तनहाईयों में ही मौजूद रहते हैं।
इस उत्सव में एक की उपस्थिति चर्चा में है तो दूसरे की अनुपस्थिति। अनुपस्थिति से मेरा संकेत 'मिडनाईट चिल्ड्रेन' के प्रख्यात लेखक सलमान रूश्दी से है। मुझे लगता है कि उनकी अनुपस्थिति से इस उत्सव को ज्यादा महत्व और चर्चा मिली है। वैसे यह अपने आप में एक दुखद तथ्य है कि एक जनतांत्रिक देश में जिसमें कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सबसे ज्यादा तरजीह मिलनी चाहिए, हमें एक ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है जो हमारे जीवन-मूल्यों और परम्परा के अनुकूल नहीं है। लेखक की अपनी उपस्थिति का सवाल अगर छोड़ भी दें तो उसकी अनुपस्थिति में उसके लिखे को पढ़ा जाना भी अपराध है, इस बात का आभास होता है जो कि निश्चित ही दुखद है और जिस पर क्षोभ ही व्यक्त किया जा सकता है। फारसी के प्रख्यात लेखक मोहसिन रवानी ने सत्रहवीं सदी में कहा था कि ''हिन्दू वे लोग हैं जो आपस में लगातार विरोध करते रहते हैं और कभी-कभी सहमत भी हो जाते हैं।'' इस बात से यह समझा जा सकता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारी बहुत पुरानी और प्रिय परम्परा है।
इस उत्सव में अपनी उपस्थिति से चर्चा में है- ओप्राह विनफ्रे। ओप्राह का जन्म 29 जनवरी 1954 को कोसेक्सू मिसीसिप्पी में हुआ। उनकी मां अभी अपनी किशोरावस्था में ही थीं और उनका ब्याह भी नहीं हुआ था। वे एक घर में नौकरानी का काम करती थीं जहां उन्हें दैहिक शोषण के अलावा और भी मानसिक प्रताड़नाएं झेलनी पड़ती थीं। ओप्राह भी जब तेरह साल की थीं तो उन्हें एक बाल सुधार गृह में भेज दिया गया। उन्होंने भी अपनी किशोरावस्था में एक बच्चे को जन्म दिया जिसकी बाद में मृत्यु हो गई। एक तकलीफदेह जीवन संघर्ष को पार करते हुए सत्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने सौंदर्य प्रतियोगिता में एक महत्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त किया और रेडियो तथा टेलीविान मेें कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगीं जो कि बेहद लोकप्रिय हुए। उनका सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रिय कार्यक्रम ''द ओप्राहा विनफ्रे शो'' सितम्बर 1985 में आरंभ हुआ जिसने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्रदान की। इसे भी एक तरह की विसंगति ही कहा जाएगा कि इतने संघर्षशील व्यक्तित्व वाली ओप्राहा विनफ्रे को भी जब हमारा अंग्रोी का मीडिया लोगों के सामने प्रस्तुत करता है तो उसमें अभिजात्य और ग्लैमर का पुट इतना ज्यादा होता है कि किसी व्यक्ति का सारा संघर्ष गौण हो जाता है और जो सामने आता है उसमें सिर्फ एक तरह का धुंधलका होता है। ओप्राहा ने अपने जीवन में जो संघर्ष किया है और आज जिस मुकाम पर वे हैं, निश्चित ही उसकी तारीफ करनी होगी लेकिन सवाल यह है कि हमारे अंग्रेंजी मीडिया को अपने आसपास सब कुछ धुंधला ही क्यों दिखाई देता है। अभी पिछले साल ही सन् 2011 में हिन्दी के वरिष्ठ कवियों बाबा नागार्जुन, सच्चिदानंद, हीरानंद वात्सायन 'अज्ञेय' और केदारनाथ अग्रवाल की जन्म शताब्दियां थीं। मुझे नहीं लगता कि हमारे अंग्रेजी के इन प्रस्तुतकर्ताओं ने इन कवियों के नाम भी सुने होंगे। क्या अंग्रेजी के मीडियाकर्मी होने के नाते इनसे इतनी भी अपेक्षा नहीं की जा सकती कि हिन्दी के प्रतिष्ठित कवियों के न केवल नाम उन्हें मालूम हों बल्कि उनकी 'स्टार-वैल्यू' का भी पता हो। और सिर्फ हिन्दी ही क्यों अन्य भाषाओं जिनका समृध्द लेखन उपलब्ध है और जिन्हें पढ़ने वालों की एक बड़ी संख्या है, उन्हें भी अंग्रेजी के समाचारों में शामिल करने में कोई गुरेंज नहीं होना चाहिए। सिर्फ समाचार ही क्यों उन पर अंग्रोी में लघु-फिल्में और वृत्तचित्र भी तैयार करके दिखाए जाने चाहिए।
मेरी स्पष्ट मान्यता के अनुसार, जब तक जयपुर साहित्योत्सव जैसे कार्यक्रम में वामपंथी लेखक संगठनों के लोग शामिल नहीं होंगे तब तक, इस तरह के आयोजन अर्थहीन हैं। साहित्य का अभिजात्य उसके लोकरंग में होता है, विशिष्टता में नहीं, कबीर, तुलसी, मीरा और नानक अगर आज भी सामान्य जनमानस की जुबान पर है तो अपने अर्थ और जीवंतता के नाम पर है, कला और अभिजात्य के कारण नहीं। साहित्य से सरोकार रखने वाले आयोजकों को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए।
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